सरितासिंह बड़ाईक की 'घासवाली' कविता में आदिवासी स्त्री की संवेदनशीलता
-Dr.Dilip Girhe
प्रस्तावना:
भारतीय साहित्य में आदिवासी जीवन, संस्कृति और संघर्षों को अभिव्यक्त करने वाली रचनाएँ विशेष महत्त्व रखती हैं। आदिवासी साहित्य केवल प्रकृति और परंपराओं का चित्रण नहीं करता, बल्कि उस समाज की पीड़ा, अस्मिता, संवेदनशीलता और संघर्षशीलता को भी उजागर करता है। विशेष रूप से आदिवासी स्त्री का जीवन अनेक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से भरा हुआ है। वह एक ओर परिवार और आजीविका की जिम्मेदारियाँ निभाती है, तो दूसरी ओर समाज में व्याप्त भेदभाव, उपेक्षा और शोषण का भी सामना करती है। इसी यथार्थ को अनेक समकालीन कवियों और लेखकों ने अपनी रचनाओं में सशक्त रूप से व्यक्त किया है। सरितासिंह बड़ाईक की कविता 'घासवाली' आदिवासी स्त्री के जीवन की इसी संवेदनशीलता और संघर्ष को सामने लाने वाली एक महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता में कवयित्री ने एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली घटना के माध्यम से समाज की गहरी मानसिकता और वर्गीय भेदभाव को उजागर किया है। घास बेचने वाली एक आदिवासी स्त्री, जो अपने श्रम के बल पर जीवनयापन करती है, उसे केवल एक वस्तु की तरह देखा जाता है। घास का मोल-भाव करने के बहाने उसके शरीर को छूने की कोशिश की जाती है, जिससे उसकी आत्मसम्मान की भावना आहत होती है। कविता का यह प्रसंग केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि उस व्यापक सामाजिक सच्चाई का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें गरीब, ग्रामीण और आदिवासी स्त्रियों के साथ असमान और अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। दूसरी ओर आधुनिक वेशभूषा और उच्च वर्ग की महिलाओं के प्रति समाज का व्यवहार अलग होता है। 'घासवाली' कविता आदिवासी स्त्री की संवेदनशीलता, आत्मसम्मान और सामाजिक विषमता के प्रश्न को गहराई से उठाती है। यह कविता पाठक को समाज की उस मानसिकता पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है, जिसमें स्त्री के सम्मान का मूल्य उसकी सामाजिक स्थिति और बाहरी रूप-रंग के आधार पर तय किया जाता है।
घासवाली
देख कर घास का गट्ठर
मोल-भाव करते हुए
जब अजनबी हाथ छूते हैं
उसकी कलाई के ऊपर
बाँह और उसके आस-पास की देह
उबलता लहू
दौड़ता उसकी शिराओं में
एक सनसनीखेज़ खबर की तरह
उबल पड़ती है वह
तिरस्कार से
'मैं घास बेचती हूँ बाबू देह नहीं।'
आक्रोशित आँखें कहतीं
पर जुबान रहती निःशब्द !
जुल्फें कटी
पहने आधुनिक लिबास
जब कोई
उसी अजनबी से टकराती
हाथ जोड़ कर कहता वह झट-पट
'सारी मैडम !'
-सरितासिंह बड़ाईक
सरितासिंह बड़ाईक की कविता 'घासवाली' आदिवासी स्त्री की संवेदनशीलता, आत्मसम्मान और सामाजिक विषमता को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कविता केवल एक घास बेचने वाली स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि समाज में मौजूद वर्गीय और लैंगिक भेदभाव की गहरी सच्चाई को उजागर करती है। कविता की शुरुआत उस दृश्य से होती है, जहाँ एक आदिवासी स्त्री अपने सिर पर घास का गट्ठर लेकर उसे बेचने के लिए खड़ी है। ग्राहक उससे घास का मोल-भाव करते हैं, लेकिन इसी बहाने वे उसके शरीर को छूने का प्रयास भी करते हैं। जब कोई अजनबी व्यक्ति उसकी कलाई, बाँह या शरीर के आस-पास छूता है, तो उसके भीतर गुस्सा और अपमान की भावना उबलने लगती है। उसकी नसों में खून ऐसे दौड़ता है जैसे कोई सनसनीखेज़ खबर फैल गई हो। इस स्थिति में वह भीतर से आक्रोशित हो उठती है। हालाँकि उसके मन में यह स्पष्ट भाव होता है कि वह केवल घास बेचती है, अपना शरीर नहीं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक मजबूरियों के कारण वह यह बात खुलकर कह नहीं पाती। उसकी आँखों में तिरस्कार और विरोध साफ दिखाई देता है, पर उसकी जुबान निःशब्द रह जाती है। यहाँ कवयित्री ने यह दिखाया है कि समाज में कमजोर और गरीब वर्ग की स्त्रियाँ अक्सर अपमान सहने को मजबूर हो जाती हैं, क्योंकि उनके पास विरोध करने की पर्याप्त सामाजिक शक्ति या सुरक्षा नहीं होती। कविता का दूसरा हिस्सा समाज की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करता है। जब वही अजनबी व्यक्ति किसी आधुनिक कपड़े पहने, शिक्षित या उच्च वर्ग की महिला से टकराता है, तो तुरंत हाथ जोड़कर 'सॉरी मैडम' कह देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मान का व्यवहार उनकी आर्थिक स्थिति, पहनावे और सामाजिक वर्ग के आधार पर बदल जाता है।वर्तमान समय में भी यह स्थिति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की कई महिलाएँ जब शहरों में सब्ज़ी, लकड़ी या घास बेचने आती हैं, तो उन्हें अक्सर तिरस्कार या अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर आधुनिक और संपन्न वर्ग की महिलाओं के साथ लोग अधिक सावधानी और सम्मान का व्यवहार करते हैं। यह स्थिति समाज में मौजूद वर्गीय भेदभाव और मानसिक असमानता को दर्शाती है। इसके अतिरिक्त यह कविता स्त्री-अस्मिता और आत्मसम्मान के प्रश्न को भी सामने लाती है। आज के दौर में 'मी टू आंदोलन' जैसे कई सामाजिक अभियानों ने महिलाओं को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए आवाज़ उठाने का साहस दिया है। लेकिन समाज के हाशिए पर रहने वाली आदिवासी और ग्रामीण स्त्रियों तक यह चेतना अभी भी पूरी तरह नहीं पहुँच पाई है। ऐसे ही 'घासवाली' कविता आदिवासी स्त्री की संवेदनशीलता, आत्मसम्मान और संघर्ष को उजागर करते हुए समाज में व्याप्त वर्गीय और लैंगिक असमानताओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है। कवयित्री इस कविता के माध्यम से यह संदेश देती हैं कि हर स्त्री, चाहे वह किसी भी वर्ग या समुदाय की हो, सम्मान और गरिमा की अधिकारी है। समाज को अपनी मानसिकता बदलकर सभी स्त्रियों के प्रति समान सम्मान और संवेदनशीलता का व्यवहार करना चाहिए।
निष्कर्ष:
सरितासिंह बड़ाईक की कविता 'घासवाली' आदिवासी स्त्री के आत्मसम्मान, संवेदनशीलता और संघर्षशीलता का सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता एक साधारण-सी घटना के माध्यम से समाज में व्याप्त गहरे वर्गीय और लैंगिक भेदभाव को उजागर करती है। घास बेचने वाली आदिवासी स्त्री का मौन आक्रोश यह दर्शाता है कि वह भीतर से अत्यंत जागरूक और आत्मसम्मानी है, परंतु सामाजिक परिस्थितियाँ और आर्थिक मजबूरियाँ उसे खुलकर विरोध करने से रोक देती हैं। कविता में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समाज का व्यवहार स्त्रियों के प्रति समान नहीं होता। एक ओर गरीब और श्रमिक वर्ग की स्त्रियों को अक्सर तिरस्कार और शोषण का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक और संपन्न वर्ग की महिलाओं के प्रति लोग सम्मान और शिष्टाचार का प्रदर्शन करते हैं। यह स्थिति हमारे समाज की मानसिक असमानता और संवेदनहीनता को दर्शाती है। 'घासवाली' कविता हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि वास्तविक सम्मान केवल बाहरी दिखावे या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि हर व्यक्ति को उसकी मानवीय गरिमा के आधार पर समान सम्मान मिलना चाहिए। विशेष रूप से आदिवासी और श्रमिक वर्ग की स्त्रियाँ, जो अपने श्रम के माध्यम से जीवनयापन करती हैं, वे भी उतनी ही सम्मान की अधिकारी हैं जितनी समाज के अन्य वर्गों की महिलाएँ। अतः यह कविता केवल आदिवासी स्त्री की पीड़ा का चित्रण नहीं करती, बल्कि समाज को एक नैतिक संदेश भी देती है। यह हमें अपनी मानसिकता बदलने और स्त्री के प्रति समानता, संवेदनशीलता और सम्मान का व्यवहार अपनाने की प्रेरणा देती है। इसी दृष्टि से 'घासवाली' कविता समकालीन सामाजिक चेतना को जागृत करने वाली एक महत्त्वपूर्ण और सार्थक रचना सिद्ध होती है।
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