गुरुवार, 12 मार्च 2026

माँ ने बच्चों को दिया आश्वासन-"बच्चों सो जाओ कल तुम्हें खाना मिलेगा"- shivalal Kiski I Ashvasan Kavita

 

माँ ने बच्चों को दिया आश्वासन-"बच्चों सो जाओ कल तुम्हें खाना मिलेगा"

-Dr. Dilip Girhe

प्रस्तावना:

कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि वह समाज की वास्तविक परिस्थितियों और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण भी करती है। विशेष रूप से आदिवासी साहित्य में जीवन के संघर्ष, अभाव, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक विषमता की गहरी झलक मिलती है। आदिवासी कवि शिवलाल किस्कू की कविता 'आश्वासन' इसी परंपरा की एक मार्मिक और संवेदनशील रचना है, जो समाज के गरीब और वंचित वर्ग के जीवन की कठोर सच्चाइयों को सामने लाती है। यह कविता केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि उन लाखों गरीब परिवारों की स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है, जो आर्थिक अभाव, बेरोजगारी और भूख जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कविता में एक ऐसे परिवार का चित्रण किया गया है, जहाँ गरीबी इतनी गहरी है कि घर में चूल्हा तक नहीं जल पाता। घर में न चावल है, न दाल, न आटा और न ही कोई अन्य अनाज। ऐसे में बच्चों को भोजन देना तो दूर, भोजन पकाने की संभावना भी समाप्त हो जाती है। इस स्थिति में माँ या पिता बच्चों को भूखे ही सुलाने के लिए विवश हो जाते हैं, परंतु वे उन्हें निराश नहीं करते। वे उन्हें यह कहकर सांत्वना देते हैं कि 'कल तुम्हें खाना मिलेगा।' यही आश्वासन इस कविता का केंद्रीय भाव है। यह कविता समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता और बेरोजगारी की समस्या को भी उजागर करती है। आज के समय में भी अनेक ग्रामीण और आदिवासी परिवार मजदूरी और अस्थायी काम पर निर्भर रहते हैं। जब काम नहीं मिलता या मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं होता, तब उनके सामने भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता भी संकट बन जाती है। 'आश्वासन' कविता केवल गरीबी की कथा नहीं कहती, बल्कि मानवीय संवेदना, संघर्ष और आशा के उस भाव को भी व्यक्त करती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को जीवन जीने की शक्ति देता है।

आश्वासन

आज

उसके यहाँ

चूल्हा जला नहीं 

खाना पका नहीं 

कारण


न चावल था न दाल 

न आटा था न 'बाल' 

न चना न जौ 

न बाजरा न ज्वार 

न 'कोदो" न मड़आ 

कुछ भी नहीं था 

आखिर 

पकता तो क्या पकता?


वह हारकर बैठ गया था 

इसलिए कि 

न कहीं कोई काम है 

न पहले का दाम है 

न पैंचा न उधार है 

उसे, कुछ भी नहीं मिला था।


इसलिए

यह कहकर बच्चों को भूखे ही सुला दिया 

कि 

कल सुबह निश्चित ही कोई जुगाड़ होगा 

चूल्हा जलेगा 

मकई का घाठौँ' ही सही 

खाना जरूर पकेगा !

-शिवलाल किस्कू

आदिवासी कवि शिवलाल किस्कू की कविता 'आश्वासन' अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील कविता है, जो समाज के गरीब और वंचित वर्ग के जीवन की कठोर सच्चाइयों को उजागर करती है। इस कविता में एक ऐसे परिवार की स्थिति का चित्रण किया गया है, जहाँ गरीबी और अभाव के कारण चूल्हा तक नहीं जल पाता। कविता का मूल भाव भूख, बेरोजगारी और असहायता की उस स्थिति को दर्शाना है, जिसमें एक माँ या पिता अपने बच्चों को केवल आश्वासन देकर सुलाने के लिए विवश हो जाते हैं। कविता के अनुसार उस दिन घर में चूल्हा नहीं जला, क्योंकि भोजन पकाने के लिए कोई अनाज उपलब्ध नहीं था। घर में न चावल था, न दाल, न आटा और न ही चना, जौ, बाजरा, ज्वार जैसे सामान्य अनाज। यहाँ तक कि आदिवासी समाज में प्रचलित कोदो और मड़आ जैसे मोटे अनाज भी घर में नहीं थे। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब घर में कुछ भी नहीं है, तो आखिर पकाया भी क्या जा सकता है। यह स्थिति केवल आर्थिक अभाव का चित्रण नहीं करती, बल्कि उस गहरी पीड़ा को भी व्यक्त करती है जो भूख से जूझते परिवारों के जीवन का हिस्सा बन जाती है। कविता में आगे बताया गया है कि परिवार का मुखिया हारकर बैठ गया है, क्योंकि उसे कहीं कोई काम नहीं मिल रहा है। आज के समय में भी बेरोजगारी और अस्थायी मजदूरी की समस्या ग्रामीण और आदिवासी समाज में व्यापक रूप से देखी जाती है। कई बार मजदूरों को काम मिलने के बाद भी समय पर मजदूरी नहीं मिलती। कविता में “न कहीं कोई काम है, न पहले का दाम है” जैसी पंक्तियाँ इसी वास्तविकता को दर्शाती हैं। इसके साथ ही अब कोई उधार देने वाला भी नहीं बचा है, जिससे उनकी कठिनाई और बढ़ जाती है। वर्तमान संदर्भ में यह कविता और भी अधिक प्रासंगिक होती है। आज भी देश के अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लोग आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और महँगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। उदाहरण के लिए कई बार समाचारों में यह देखने को मिलता है कि गरीब परिवारों को भोजन के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। महामारी के समय या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी अनेक मजदूर और गरीब परिवार भोजन के संकट से गुजरते रहे हैं। ऐसे समय में सरकारी योजनाएँ जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन व्यवस्था) या मनरेगा जैसी योजनाएँ कुछ हद तक सहारा देती हैं, किंतु कई बार इनका लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता। कविता का सबसे मार्मिक प्रसंग वह है जब माँ अपने बच्चों को भूखे ही सुला देती है, लेकिन उनके सामने निराशा प्रकट नहीं करती। वह बच्चों को यह कहकर सांत्वना देती है कि “कल सुबह निश्चित ही कोई जुगाड़ होगा।” यह आश्वासन केवल बच्चों को दिलासा देने के लिए नहीं है, बल्कि जीवन में आशा और विश्वास को बनाए रखने का एक माध्यम भी है। माँ को उम्मीद है कि कल चूल्हा अवश्य जलेगा और चाहे मकई का साधारण घाठौं ही क्यों न बने, परंतु भोजन जरूर पक जाएगा। इस प्रकार 'आश्वासन' कविता केवल गरीबी और भूख की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदना, संघर्ष और आशा की भी कथा है। यह कविता हमें समाज की उस सच्चाई से परिचित कराती है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। साथ ही यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि समाज और सरकार को मिलकर ऐसी परिस्थितियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि किसी भी माँ को अपने बच्चों को भूखे पेट केवल आश्वासन देकर सुलाने की नौबत न आए।

निष्कर्ष :

अंततः कहा जा सकता है कि शिवलाल किस्कू की कविता 'आश्वासन' समाज के गरीब और वंचित वर्ग के जीवन की पीड़ा और संघर्ष का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करती है। कविता में भूख, बेरोजगारी और आर्थिक अभाव की स्थिति को बहुत ही सरल किंतु मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया गया है। जब घर में भोजन के लिए कोई अनाज नहीं होता और काम मिलने की भी कोई संभावना नहीं होती, तब परिवार के सामने जीवन का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे समय में माता-पिता के पास बच्चों को देने के लिए केवल एक ही सहारा बचता है—आश्वासन। कविता में माँ या पिता द्वारा बच्चों को दिया गया यह आश्वासन केवल एक साधारण सांत्वना नहीं है, बल्कि यह उस अटूट विश्वास और उम्मीद का प्रतीक है, जो कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को टूटने नहीं देता। माँ अपने बच्चों को यह कहकर सुला देती है कि “कल सुबह निश्चित ही कोई जुगाड़ होगा।” यह कथन मानव जीवन में आशा की महत्ता को दर्शाता है। चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों, मनुष्य उम्मीद के सहारे आगे बढ़ता रहता है। वर्तमान सामाजिक संदर्भ में भी यह कविता अत्यंत प्रासंगिक है। आज भी समाज में अनेक लोग गरीबी, बेरोजगारी और महँगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में यह कविता हमें संवेदनशील बनने और समाज के कमजोर वर्गों की समस्याओं को समझने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह संकेत भी देती है कि समाज और शासन को मिलकर ऐसी परिस्थितियों को दूर करने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए, ताकि किसी भी परिवार को भूखे पेट सोने के लिए मजबूर न होना पड़े। इस प्रकार 'आश्वासन' कविता केवल गरीबी और भूख की कथा नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदना, संघर्ष और आशा का सशक्त संदेश भी देती है। यही इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता और प्रासंगिकता है।

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