वंदना टेटे की कविता में प्रतिरोध के स्वर
-Dr. Dilip Girhe
रची जा रही है
रची जा रही है।
साजिशें ऐसी
कि हो रही है जमीन हमारी
हमारे ही खून से लहूलुहान
चल रही लाठियां
हमारे ही बदन पर
तन भेद रही संगीनें
हमें ही लक्ष्य कर
और कई जोड़ी आंखें
बेध रही हैं हमें
रची जा रहीं हैं
साजिशें गहरी-गहरी
हमारे ही खात्मे के लिए
बिछाए जा रहे हैं फंदे
ताकि
तुम्हारे विकास की गाड़ी
दौड़ सके रौंदती हुई हमारे
भूत वर्त्तमान और भविष्य को
कुछ इस तरह
कि न उठ सके कोई दोबारा
और न कर सके कोई दावा।
-वंदना टेटे-कोनजोगा
काव्य की संवेदना:-
आदिवासी कवि आज जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए कलम के जरिये प्रतिरोध कर रहा है। वह अपना प्रतिरोध काव्य में रेखांकित कर रहा है। ऐसा ही प्रतिरोध कवयित्री वंदना टेटे अपनी कविता 'रची जा रही है' कविता में करती है। वे झारखंड के आदिवासियों के जल, जंगल, और जमीन जैसे संसाधनों के मुद्दों को चित्रित करती है। वे उन साजिशों के बारे कहती है जो साजिशें आदिवासियों की संसाधनों को हड़प ने के लिए रची जा रही है। वे कविता में लिखती हैं कि ऐसी साजिशें रची जा रही है। जिसकी वजह से सम्पूर्ण आदिवसियों की ज़मीन उनके ही खून से लहूलुहान हो चुकी है। उनकी ही जमीनों से उनको लाठियां मार-मार मार कर भगाया जा रहा है।
वे आगे लिखती है कि ऐसी भी साजिशें रची जा रही है जिसकी वजह से आदिवासियों का अस्तित्व ही पूर्णतः ख़त्म होता दिखाई पड़ रहा है। साथ ही ऐसे फंदे भी बिछाए जा रहे हैं जिसमें फस सकें आदिवासी समाज। आदिवसियों का वर्तमान और भविष्य को लेकर गढ़ी जा रही है विकास की योजनाएं। लेकिन वह योजनाएं केवल आदिवासी विस्थापन के लिए जानी जाती है। जिसकी वजह से हजारों आदिवासियों को होना पड़ रहा है अपने ही घरों से या जमीनों से विस्थापित।
इस प्रकार से कवयित्री वंदना टेटे अपनी कविता में प्रतिरोध को व्यक्त करती है।
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