मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

भूमंडलीकरण और झारखंडी आदिवासी भाषा अस्तित्व

 


भूमंडलीकरण और झारखंडी आदिवासी भाषा अस्तित्व

-Dr Dilip Girhe

विकास की अवधारणाएं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, बुनियादी ढांचे को ही प्राथमिकता दी जाती है और भाषा, साहित्य और संस्कृति को अक्सर उपेक्षित किया जाता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी समाज का वास्तविक और सम्पूर्ण विकास तभी संभव है जब उसकी भाषा, साहित्य और संस्कृति को सुरक्षित रखा जाए। इन तत्वों के बिना कोई समाज अपनी पहचान और अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम नहीं हो सकता। वैश्वीकरण के संदर्भ में आपने जिस तरह से सोवियत संघ के पतन और एकध्रुवीय अमेरिकी वर्चस्व के बाद बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद के उदय को देखा किया है, वह बहुत सटीक है। वैश्वीकरण ने वास्तव में बड़े पैमाने पर आर्थिक और सांस्कृतिक शक्तियों का दबदबा बढ़ाया है, जिसका असर उन समुदायों पर विशेष रूप से पड़ा है जो पहले से ही समाज के हाशिए पर थे। जैसे किसान, मजदूर, आदिवासी और दलित समुदाय। अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में आदिवासी भाषाओं और साहित्य का संकट और गहरा गया है, क्योंकि इनकी पहचान और संघर्ष की आवाज़ को दबाने की कोशिशें लगातार बढ़ी हैं। 

आदिवासी साहित्य में प्रतिरोध की आवाज़ गूंज रही है, एक उम्मीद की किरण है। यह प्रतिरोध केवल आर्थिक या राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और अस्तित्व के स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। आदिवासी साहित्य, जो उनकी भाषाओं में लिखा जा रहा है, न केवल उनकी अस्मिता और पहचान को बचाने की कोशिश है, बल्कि यह वैश्वीकरण के जनविरोधी रूप के खिलाफ एक शक्तिशाली प्रतिक्रिया भी है। आदिवासी साहित्य में बढ़ते प्रतिरोध के स्वर वैश्वीकरण की चुनौतियों का मुकाबला कर पाएंगे? और यदि हां, तो क्या सरकारों और शैक्षिक संस्थानों को इस साहित्य और भाषाओं को बचाने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठाने चाहिए? खासकर आदिवासी समाजों और उनकी भाषाओं पर इसके खतरनाक प्रभावों को लेकर।  भूमंडलीकरण ने न केवल आर्थिक और राजनीतिक रूप से कई देशों को प्रभावित किया है, बल्कि यह सांस्कृतिक स्तर पर भी एक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया को जन्म दे रहा है, जिसमें पश्चिमी देशों की भोगवादी संस्कृति को हर स्थान पर थोपने की कोशिश की जा रही है। इससे स्थानीय भाषाएं और सांस्कृतिक धरोहरें जो समाज की पहचान का हिस्सा हैं, वह खतरे में पड़ रही हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट में भारत की 196 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में होना सचमुच चिंताजनक है। विशेष रूप से झारखंड की आदिवासी भाषाओं का संकट इस बात का संकेत है कि ये भाषाएं न केवल भाषा के रूप में बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में समाप्त होती जा रही हैं। 

जैसे कि किसी भाषा की मृत्यु का मतलब उस समुदाय की संपूर्ण सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का संकट है। यह सिर्फ एक भाषा की समाप्ति नहीं होती, बल्कि उस समुदाय के इतिहास, परंपराओं, मूल्यों और पहचान की भी समाप्ति होती है। यह सवाल सच में बहुत गंभीर है कि आदिवासी भाषाओं को बचाने और उनका संरक्षण कैसे किया जाए। क्योंकि जब तक इन भाषाओं का संरक्षण नहीं होगा, तब तक आदिवासी समाज की पहचान और उनके संघर्ष की कहानी को समाज तक पहुँचाने में बड़ी मुश्किलें आएंगी। आदिवासी साहित्य उन भाषाओं में लिखा जाता है, वह उन संघर्ष और अस्मिता की आवाज़ को प्रतिध्वनित करता है, जो वैश्वीकरण और उपनिवेशीकरण की आक्रामकता के खिलाफ है। क्या आपको लगता है कि इस संकट को दूर करने के लिए सरकारें, शैक्षिक संस्थाएं और सामाजिक संगठन और भी सक्रिय कदम उठा सकते हैं? क्या आदिवासी भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए किसी व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता है? आज आदिवासी साहित्यकारों आदिवासी भाषाओं और उनके साहित्य की स्थिति को बहुत सटीक और प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है। यह सच है कि भारत में जितनी भाषाएं और बोलियां हैं, उनमें से कई आदिवासी भाषाएं आज भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, और उनका अस्तित्व संकट में है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, जिनमें से सिर्फ संताली और बोड़ो जैसी दो आदिवासी भाषाएं शामिल हैं, जबकि अन्य आदिवासी भाषाएं, जो समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं, वह उपेक्षित रह जाती हैं। 

हमने जिस भेदभावपूर्ण रवैये की बात की है, वह न केवल आदिवासी भाषाओं के अस्तित्व को संकट में डाल रहा है, बल्कि यह पूरी तरह से उनकी सांस्कृतिक पहचान को भी मिटाने की कोशिश कर रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में जो संसाधन मौजूद हैं, उन्हें लूटने की प्रक्रिया में उनके सांस्कृतिक और भाषाई अस्तित्व को खत्म करने का प्रयास किया गया है। यह बहुत दुखद है कि बाहरी सांस्कृतिक संरचनाओं को जबरन आदिवासी समाज पर थोपने के कारण वे अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, और शिक्षा की व्यवस्था में आदिवासी भाषाओं को बहिष्कृत किया जा रहा है। झारखंड की आदिवासी भाषाएं, जैसे संताली, मुंडारी, हो, कुडुख, खड़िया, असुरी, मल्तो और अन्य, अब भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह उन भाषाओं की जीवंतता और संघर्ष का प्रतीक है, जो न केवल बोल-चाल में बल्कि साहित्यिक रूप में भी अपनी जगह बना रही हैं। 

अंग्रेज मिशनरियों और भाषाविदों ने भले ही अपने तरीकों से इन भाषाओं में योगदान दिया हो, लेकिन आज इन भाषाओं और उनके साहित्य में जो विविधता और समृद्धि है, वह आदिवासी समाज की अंतर्निहित शक्ति और जिजीविषा को दर्शाती है। यह महत्वपूर्ण है कि इस साहित्य को समाज और सरकार द्वारा उचित मान्यता दी जाए, ताकि यह अपनी पूरी शक्ति के साथ न केवल आदिवासी समाज को अपनी पहचान और संघर्ष की याद दिला सके, बल्कि पूरे देश को यह समझा सके कि कोई भी सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर कभी भी लुप्त नहीं होनी चाहिए। इन भाषाओं में लिखे गए साहित्य के द्वारा आदिवासी समुदायों के संघर्ष, सुख-दुःख और सपनों की अभिव्यक्ति को सभी तक पहुँचाना चाहिए। हमारे विचार से क्या इस संघर्ष को और प्रभावी बनाने के लिए आदिवासी साहित्य को एक वैश्विक मंच पर पहचान मिलनी चाहिए? और क्या सरकारी नीतियों में कोई विशेष बदलाव जरूरी है, ताकि आदिवासी भाषाओं और साहित्य को बढ़ावा दिया जा सके?

हमने जिस गहराई से आदिवासी भाषा-साहित्य के संकट और उसके संरक्षण के मुद्दे को उठाया है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सचमुच भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की जड़ें, उसकी पहचान, संस्कृति और संघर्षों का संवाहक है। आदिवासी भाषाओं में न केवल इतिहास और परंपराओं की गहरी छाप होती है, बल्कि यह उस समुदाय की जीवनशैली, उसकी नैतिकता और प्राकृतिक ज्ञान का भी प्रतिनिधित्व करती है। यह आदिवासी समाज के अस्तित्व की अभिव्यक्ति है और यदि यह खत्म हो जाती है, तो न केवल भाषा बल्कि पूरी संस्कृति का अवसान हो जाता है। वैश्वीकरण के दौर में यह संकट और भी गंभीर हो गया है। जब दुनिया को एक छोटे से गांव में बदलने की योजना बनाई जा रही है, तो इससे आदिवासी समाज की भाषाओं और संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। जैसा कि हम पाते है कि आदिवासी क्षेत्रों में अद्वितीय प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, और इन संसाधनों की लूट के लिए आदिवासी समाज को सत्ता और शक्ति से दूर रखा जा रहा है। उनकी भाषाओं, साहित्य और संस्कृति को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि वे अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के साथ खड़े न हो सकें। 

आज जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां और बड़े व्यापारिक हित एकजुट हो रहे हैं, आदिवासी भाषाएं और साहित्य एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। इस प्रक्रिया में उनकी भाषा-संस्कृति को समाप्त करना आवश्यक है, ताकि उन क्षेत्रों के संसाधनों का दोहन किया जा सके। यह प्रक्रिया न केवल उनके अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि यह एक तरह से उपनिवेशवाद का नया रूप है, जहां सांस्कृतिक धरोहर को कुचला जा रहा है। आदिवासी साहित्य और भाषाओं को खत्म करने के लिए वैश्विक स्तर पर बड़ी-बड़ी भाषाओं का उपयोग किया जा रहा है, जो कभी न कभी पूरे समाज पर अपना दबाव डालकर उसे अपनी ओर खींचने का प्रयास करेंगे। लेकिन यह भी एक संघर्ष है, जो केवल आदिवासी समाज का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के उन सभी समुदायों का है, जिनकी सांस्कृतिक धरोहर खतरे में है। इस संकट से निपटने के लिए आदिवासी साहित्य और भाषाओं का संरक्षण और प्रसार जरूरी है। क्या आपके हिसाब से इस संकट को दूर करने के लिए कोई विशेष सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता है, जो आदिवासी समाज की भाषाओं और साहित्य को बचा सके और वैश्वीकरण के इस आक्रमण के खिलाफ एक मजबूत आवाज बना सके?

हमने भूमंडलीकरण के नव-उपनिवेशवादी रूप को बहुत सही तरीके से प्रस्तुत किया है। जैसा कि हमने उल्लेख किया है कि आज का वैश्विक युग कारपोरेट राजनीति और मल्टीनेशनल कंपनियों के प्रभाव में है, जो न केवल आर्थिक नीतियों को आकार दे रही हैं, बल्कि संस्कृतियों और सभ्यताओं को भी प्रभावित कर रही हैं। इन कंपनियों की धन-लोलुपता ने जीवन-मूल्यों को कमजोर किया है और यह मानवता के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। जब एक उपभोक्ता संस्कृति को समाज पर थोपने का प्रयास होता है, तो यह न केवल आदिवासी समाज बल्कि पूरी दुनिया की सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करने की ओर ले जाता है। हमने जिस सांस्कृतिक आंदोलनों के नए दौर का उल्लेख किया है, वह बहुत अहम है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य तीसरी दुनिया के देशों में जहां उपनिवेशवाद और अब वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने गहरे निशान छोड़े हैं, वहां सांस्कृतिक प्रतिरोध और पुनर्निर्माण का एक नया कदम उठाया जा रहा है। इन आंदोलनों का उद्देश्य अपनी पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को बचाना है, जो पूंजीवादी व्यवस्था और वैश्विक बाजार के हमले से जूझ रहे हैं। आदिवासी साहित्य भी इस प्रतिरोध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। 

आज जब आदिवासी भाषाएं और साहित्य अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं, यह जरूरी है कि हम इसे संरक्षित करने के साथ-साथ इसे एक नई पहचान और मंच भी दें। आदिवासी साहित्य न केवल सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का एक आईना है, बल्कि यह एक गहरी सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतिनिधित्व करता है, जो पूरी दुनिया में विशेष ध्यान देने योग्य है। यह साहित्य आदिवासी समाज के संघर्ष, उनके जीवन-मूल्यों और उनके संघर्षों को उजागर करता है, जो वैश्वीकरण के इस दौर में उपेक्षित हो रहे हैं। आदिवासी साहित्य को अब केवल एक स्थानीय या क्षेत्रीय साहित्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक वैश्विक आवाज के रूप में पहचान मिलनी चाहिए। यह समय की मांग है कि हम आदिवासी साहित्य को न केवल संरक्षित करें, बल्कि उसे एक मंच पर लाकर उसे वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करें। इससे न केवल आदिवासी समाज को बल्कि पूरे समाज को अपने इतिहास, संघर्ष और सांस्कृतिक धरोहर की गहरी समझ होगी। निष्कर्ष रूप में क्या आप मानते हैं कि आज की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति में आदिवासी साहित्य को वैश्विक मंचों पर एक मजबूत जगह मिलनी चाहिए, ताकि यह न केवल अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचा सके, बल्कि समग्र मानवता के लिए एक संघर्ष की आवाज बन सके?

संदर्भ

आदिवासी साहित्य विमर्श-गंगा सहाय मीणा



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