भुजंग मेश्राम की कविता में बिरसा की पुकार
-Dr.Dilip Girhe
कहीं से भी आ मेरे बिरसा...
सब तेरी बाट जोहते...
जिस दुष्कर राह पर तू चला
वह राजमार्ग बनकर बसा हैतुम्हारी यादों की तरह...
नंगी रातों में
दहशत का साम्राज्य होते हुए भी
जैसे कि असंख्य तारों के बीच हो चांद..
मैं जब कभी
आश्रमशाला में जाता हूं
बच्चे मुझसे पूछते हैं-
‘काका,बिरसा मुण्डा कहां रहते हैं ?’
तब मैं बच्चों की उस
निश्चल भाषा में
उत्तर न देकर
बन जाता हूं गुनहगार..
बच्चे रोज रटते हैं
तेरे ही नाम की वर्णमाला
शायद तुम बतियाते होगे
बच्चों के सपनों में उतरकर
बताते होगे रहस्य..
पर वे तमाम लोग क्या करें
जो उन बच्चों की ही तरह
तुम्हारी राह देख रहे हैं ?...
सबेरे-सबेरे चक्की चलाती हुई मां
गाती है तेरे ही गीत
मैं सुनता रहता हूं आंखे बंद किए..
पहाड़ों से उतरती औरतें
जो गीत तेरे गाती हैं
हमेशा लेती हैं कसम
तुम्हारे लिए
उन्हें भी लेता हूं मैं आंखों में उतार....
लोग केवल गीत ही
नहीं गाते तेरे
वे सुनते हैं,
बोलते हैं..
मरते हैं-
घर,बाहर, पाठशाला,बाज़ार
मोर्चा और जंगल में
एक क्रांतिकारी बदलाव के लिए..
सच में इनमें से किसी ने
तुमको नहीं देखा होगा
मैंने भी नहीं..
लेकिन केवल तुम ही हो
जो हमारे विद्रोह में
अकेले दिशा देते दिखाई देते हो..
उस समय तुझे जल्दबाजी हुई थी
गोरों को खदेड़ने की खातिर ?
सिंहभूमि,मंडला,वसई
चन्द्रपुर को करने को आज़ाद ?
बचाने के लिए हरे-भरे जंगल ?
आज ना गोरे हैं
न सपनों का साम्राज्य
ना घने जंगल हैं
ना तू है
है केवल जंगलों में फैलता असंतोष
और होठों पर तेरा नन्हा-सा गीत-
ऊलगुलान ! ऊलगुलान ! ऊलगुलान !
जो बन गया है
अब हमारा सांस्कृतिक आंदोलन..
सच बताऊं, अब हमें जल्दी है
किंतु नहीं चाहते अब हम
ओढ़ी हुई सभ्यता
धिक्कारते हैं अन्धकार को
जंगल को बांटने वाली
दलाली प्रथा को
नकार है हमारा..
गूंजती हैं घाटियों में पीछा करती आवाज़-
बिरसा तुम्हें कहीं से भी
कभी भी
आना होगा..
घास काटती दरांती हो या
लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
खेत-खलिहान की मजदूरी से
दिशा-दिशाओं से
गैलरी में लाए गए
गोटुली रंग से
कारीगर की भट्टी से
यहां से वहां से
पूरब से
पश्चिम से
उत्तर से
दक्षिण से
कहीं से भी आ मेरे बिरसा
खेतों का हरा-भरा बयार बनकर
लोग तेरी ही बाट जोहते....
-भुजंग मेश्राम
काव्य संवेदना:
'कहीं से भी आ मेरे बिरसा' यह कविता बिरसा मुंडा के बलिदान को समर्पित है, बिरसा मुंडा आदिवासियों के संघर्ष योद्धा एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। कवी भुजंग मेश्राम ने बिरसा मुंडा की याद में अपनी कविता में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है साथ ही उनके संघर्ष और बलिदान को भी याद किया है। वे अपनी कविता में बिरसा मुंडा को एक प्रतिक के रूप में पेश करते हैं। वह एक आदिवासी समुदाय के लिए संघर्ष का भी एक प्रतिक है। कविता में कवि ने यह भी कहा है कि बिरसा मुंडा की याद में आदिवासी समुदाय के लोग आज भी संघर्ष कर रहे हैं और उनके अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। कवि ने यह भी कहा है कि बिरसा मुंडा की याद में आदिवासी समुदाय के लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह कविता बिरसा मुंडा की याद में एक श्रद्धांजलि है और आदिवासी समुदाय के लिए एक प्रेरणा है।
कवि भुजंग मेश्राम कहते हैं कि बिरसा आज तुम्हारी आदिवासी समाज को आज भी जरूरत है। वह अपने अस्तित्व एवं संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। वे आज भी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। जिस राजमार्ग पर तू चला है। उसी राजमार्ग पर चलने के लिए आदिवासी समुदाय के लोग तैयार है। आज भले ही चारों ओर दहशत का साम्राज्य फैला दिख रहा है। किंतु इस असंख्य समस्याओं पर आदिवासी समाज सामना कर रहा है। आश्रमशालाओं में रहने वाले बच्चे भी बार-बार पूछ रहे हैं कि 'काका! बिरसा कब आने वाले हैं?' वे बच्चे रोज उनके नाम का जाप रटे रहते हैं। लेकिन मैं उनको नहीं बता पाता हूँ कि बिरसा कब आयेंगे। साथ वे संघर्षरत तमाम लोग भी तुम्हारी राह देख रहे हैं। और बिरसा का ही गुणगान गा रहे हैं। इतना ही नहीं सुबह सबेरे अनेक माताएं भी बिरसा का ही गुणगान गा कर चक्की चलाकर आटा पिस रही है। कवि पहाड़ी इलाकों में रहने वाली आदिवासी औरतों का भी संघर्ष बताते हैं। आज एक नई क्रांतिकारी बदलाव के लिए घर-घर, पाठशालाओं एवं बाजारों में तुम्हारा गीत गाया, सुनाया और बोला जा रहा है। बिरसा तुम ही अकेले हमें मार्ग दिखाने वाले क्रांतिकारी योद्धा हो। बिरसा तुम्हारा 'उलगुलान ! उलगुलान! उलगुलान!' यह नन्हा सा गीत बन गया है एक क्रांति का नारा। जो आदिवासी सभ्यता को बचाने के लिए मदद करेगा। इसी वजह से लोग चारों दिशाओं से तुम्हारे आने का इंतजार कर रहे हैं।
ब्लॉग से जुड़ने के लिए निम्न व्हाट्सएप ग्रुप जॉइन करे...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें