संकट की गहराई
जड़े हैं
हमारी भाषा की गहराई में
छाप हैं
इतिहास, परंपरा और जीवन शैली में
संकट है
गहरा वैश्वीकरण के दौर में
ख़तरे में है
आदिवासी भाषा संस्कृति और अस्तित्व
लूट हो रही है
प्राकृतिक संसाधनों की
दूर रखा जा रहा है
सत्ता और शक्ति से
प्रयास हो रहा है
भाषा, साहित्य और संस्कृति के समाप्त का
ताकि खड़ी न हो सकें
उनकी सामाजिक धरोहर
प्रचार जरूरी है
भाषा एवं साहित्य के संरक्षण का
आवश्यकता है
एक विशेष सांस्कृतिक आंदोलन की
जो बचा सकें भाषा और साहित्य के अस्तित्व को...
-Dr.Dilip Girhe
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