मंगलवार, 18 मार्च 2025

साहित्य चिंतन और विमर्श-Dr. Dilip Girhe


साहित्य चिंतन की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। इसी परंपरा ने हिंदी, आदिवासी और दलित साहित्य की चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। हिंदी साहित्य में नवजागरण, पत्रकारिता, कथा-साहित्य, लोकसाहित्य, काव्य विधा, अनुवाद और भूमंडलीकरण जैसे मुद्दों ने चिंतन की परंपरा में एक प्रकार से गहनतम अध्ययन दृष्टि विकसित की है। यही वजह रही है कि साहित्य में दलित, आदिवासी, स्त्री, पर्यावरणीय, अल्पसंख्यक और वृद्ध जैसे विमर्शों का बोलबाला चल रहा हैं। इन्हीं विमर्शों की अपनी अहम् भूमिका रही है। इसके कारण साहित्य जगत में 'चिंतन की परंपरा' ने एक नई दृष्टि बनाई है। परिणामस्वरूप आज साहित्य चिंतन का विषय इतना व्यापक हो गया है कि जिसके कारण हम उसे आधुनिक काल के प्रथम पटल पर रख सकते हैं। उसी आधुनिकता के चिंतन ने सामाजिक यथार्थ को एक नया रूप दे दिया है। यही कारण रहा है कि साहित्य लेखन की परंपरा ने समाज के विभिन्न पहलुओं साहित्यिक लेखन के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया।

'साहित्य चिंतन और विर्मश' पुस्तक को तीन भागों में विभक्त गया हैं। पहल भाग 'हिंदी साहित्य' है। इसके अंर्तगत हिंदी नवजागरण और भारतीय महिला, हिंदी साहित्य की पत्रकारिता संक्षिप्त विवेचन, संत कबीर फिल्म का अध्ययय, स्वाधीनता पूर्व किसान कविता के विभिन्न पहलू, लोकसाहित्य का सामाजिक आधार, तुलनात्मक साहित्य और काव्यानुवाद, मुक्तिबोध का फैंटेसी सिद्धांत, हिंदी साहित्य में गांधी की उपस्थिति और मछुआरा समाज की वर्तमान परिस्थितियाँ इत्यादि मुद्दों पर गहरा चिंतन किया गया। दूसरा भाग 'आदिवासी साहित्य' में मराठी आदिवासी साहित्य का संक्षिप्त परिचय, बिरसा मुंडा का आंदोलन, अस्मितामूलक मिडिया के रूप में गोंडवाना दर्शन पत्रिका महत्त्व, 'आदिवासी मोर्चा' काव्य में भूमंडलीकरण और आम आदमी, गोंड जनजाति का लोकसाहित्य, आदिवासी और नक्सलवाद, आदिवासी कविता मराठी की वैचारिकी जैसे मुद्दे चिंतन के प्रमुख विषय हैं। तीसरा भाग 'दलित साहित्य' है। इसमें भारतीय दलित साहित्य और डॉ. भीमराव आंबेडकर, सामाजिक न्याय के लिए दलित संघर्ष, सामाजिक पुनर्रचना के शिल्पकार बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, आरक्षण का संवैधानिक पक्ष, 'मुंबई कांड' कहानी में अभिव्यक्त दलित अस्मिता के स्वर, 'छोरा कोल्हाटी का' जीवनी में चित्रित स्त्री चिंतन और महात्मा ज्योतिबा फुले का स्त्रीवादी दृष्टिकोण इत्यादि विषयों का विस्तार से चिंतन किया गया। इन्हीं विषय को मुख्य बिंदु बनाकर 'साहित्य चिंतन और विमर्श' विषय को न्याय देने की कोशिश की गई है। संबंधित अध्ययन के विषय में कुछ कमियाँ-खूबियाँ हो सकती हैं। जिसे पाठक पढ़कर और विचार-विमर्श करके अपने मत लेखक तक पहुँचा सकते हैं। जिसे आगे चलकर सुधारा जा सकता है।

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