जसिंता केरकेट्टा की कविता में भाषाई अस्तित्व का संकट
Dr. Dilip Girhe
मातृभाषा की मौत।
माँ के मुँह में ही
मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया
और बच्चे
उसकी रिहाई की माँग करते-करते
बड़े हो गए।
मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी
उसे मारा गया था
पर, माँ यह कभी न जान सकी।
रोटियों के सपने
दिखाने वाली संभावनाओं के आगे
अपने बच्चों के लिए उसने
भींच लिए थे अपने दाँत
और उन निवालों के सपनों के नीचे
दब गई थी मातृभाषा।
माँ को लगता है आज भी
एक दुर्घटना थी
मातृभाषा की मौत।
-जसिंता केरकेट्टा
काव्य की संवेदनशीलता:
जसिंता केरकेट्टा की 'मातृभाषा की मौत' कविता में मातृभाषा के महत्व के विभिन्न पहलू एवं उसका अस्तित्व नष्ट होने के अनेक कारणों को कवयित्री स्पष्ट करती है। मातृभाषा का संबंध अपनी माँ से गहरा होता है। माँ ही अपने बच्चों को मातृभाषा सिखाती है। ऐसे ही महत्व और संकट को कवि ने रेखांकित किया है। कवयित्री वर्तमान स्थिति को देखते हुए लिखती है कि आज माँ के मुंह से ही भाषा को कैद किया जा रहा है। और बच्चे बड़े होते होते उसी भाषा से रिहा भी हो रहे है। परिणामस्वरूप बच्चे भाषा को भूल रहे हैं। यानी कि मातृभाषा को मार दिया जा रहा है। आधुनिकता के दौर में तो कई समुदायों की भाषा आज नष्ट होने की कगार पर खड़ी है। रोटियों के सपने दिखाकर मातृभाषा की मौत होती हुई कवि ने अपनी आंखों से देखी है। इसी वजह से कवयित्री अपनी कलम की ताक़त प्रस्तुत कर रही है।
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