बुधवार, 19 मार्च 2025

आदिवासी स्त्रियाँ -निर्मला पुतुल काव्य संवेदना (Nirmala Putul Kavya Sanvedana)


आदिवासी स्त्रियाँ 

उनकी आँखों की पहुँच तक ही

सीमित होती उनकी दुनिया

उनकी दुनिया जैसी कई-कई दुनियाएँ

शामिल हैं इस दुनिया में

नहीं जानतीं वे

वे नहीं जानतीं कि

कैसे पहुँच जाती हैं उनकी चीज़ें दिल्ली

जबकि राजमार्ग तक पहुँचने से पहले ही

दम तोड़ देतीं उनकी दुनिया की पगडंडियाँ

नहीं जानतीं कि कैसे सूख जाती हैं

उनकी दुनिया तक आते-आते नदियाँ

तस्वीरें कैसे पहुँच जातीं हैं उनकी महानगर

नहीं जानतीं वे! नहीं जानतीं 

-निर्मला पुतुल 

काव्य संवेदना:

आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल अपनी कविता 'आदिवासी स्त्रियाँ' में ग्रामीण स्त्री एवं शहरी स्त्री की संवेदनशील प्रवृतियों का वर्णन करती है। वे कहना चाहती है कि जो आदिवासी स्त्रियाँ देहातों में अपना जीवनयापन करती है। वह भोली-भाली रहती है। उनकी आँखों की नजर सिर्फ गाँव तक ही सिमित रहती है। इसी दुनिया में उनके कई प्रकार की दुनिया रहती है। लेकिन शहरी स्त्रीयों का जीवन बिलकुल इसके विपरित होता है। वह शहरी दुनिया की सभी प्रकार की दुनियादारी जानती है। आदिवासी स्त्रियाँ शहरों तक कैसा पहुंचना है यह भी नहीं जानती। तो वह शहरों के बड़े-बड़े राजमार्ग कैसे जानेगी? उनकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ गाँव के पगडंडीयों से होकर गुजरती है। उनको यह भी पता नहीं होता कि उनके दुनिया की नदियाँ कैसे सूखी-सूखी पड़ रही है। आधुनिक दौर में हम देखते हैं है कि गाँव देहातों की आदिवासी स्त्रियों की तस्वीरें तुरंत महानगरों में पहुच जाती है। इन सभी बातों की भनक भी नहीं होती आदिवासी स्त्रियों को। इस प्रकार से निर्मला पुतुल ने अपनी कविता में  ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच के अंतर को दर्शाया है और यह भी बताया है कि ग्रामीण महिलाओं की दुनिया शहरी महिलाओं की दुनिया से अलग है।

संदर्भ:

पुतुल, निर्मला (2005).नगाड़े की तरह बजते शब्द.भारतीय ज्ञानपीठ: नई दिल्ली-पृष्ठ.11 

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